भाईसाब को लगता है कि उनके साथ जो हो रहा है वह सिर्फ उन्हीं के साथ होता है। बाकी लोग दुनिया में कितने खुश हैं। घर-परिवार, नौकरी। उनकी उम्र के लोगों के पास सबकुछ है। सबकुछ यानी सेटल्ड, पूछने पर वे यही शब्द इस्तेमाल करते हैं। और व्याख्या कुछ इस तरह कि सेटल्ड मायने घर, बीवी, बच्चे, गाड़ी, दफ्तर । समय से ऑफिस जाना-आना । कोई झंझट नहीं । सबकुद स्मूदली चल रहा हो। जब वे हो कहते हैं तो उनकी आखों में एक अजीब सा खालीपन होता है। यही वही खालीपन है जो उन्हें टीसता रहता है। संग के लोग न जाने कहां कहां पहुंच गए। और हम ---- वे जो कहते हैं वैसा कहना ठीक नहीं लग रहा है लेकिन ना कहें तो बेईमानी होगी -- यहीं गटर में पड़े हैं।
यह बात अच्छी तरह से जानी हुई है कि भाईसाब गटर में कतई नहीं हैं। लेकिन उन्होंने मान लिया है कि उनकी जो जिन्दगी है वह गटर है अगर दुनिया में कहीं नरक है तो बस उनके आस-पास ही है। बाकी तो बस स्वर्ग है।
-- चालीसा लगने वाला है। ना तो ढंग की चाकरी और ना ही कोई उद्देश्य। वह भी होता तो चल जाता। कुछ तो दुनिया के काम आते। लेकिन ऐसे मायाजाल में फंसे कि पूछो मत। ना निगलते बन रहा है ना उगलते। ना आर ना पार -- ऐसा कहते हुए वे चुप हो जाते हैं। कुछ गहरे उतरकर सोचते हैं, कोई बात तो निकले -- शायद पहले कहे गए दो जुमलों जैसा ही कोई और जुमला ढूंढ रहे हैं -- आपके पास इससे मिलता जुल्ाता कुछ हो तो उन्हें बताइयेगा।
Thursday, August 30, 2007
Friday, August 3, 2007
उमस
भाई साब पूरे दिन बेचैन रहे। क्या करें कहां जाएं। घर मं उमस थी। ध्यान दीजिएगा घर में उमस थी। जब उन्होंने खुद से ही ऐसा कहा तो लगा कि गलत कह रहे हों। बाहर मौसम अच्छा था हवा चल रही थी। और दिल्ली के मन के विपरीत बाहर निकलकर आदमी थोड़ा सुकुन से टहल सकता था। लेकिन भाईसाब बाहर नहीं निकल पा रहे थे। ऐसी कोई बात नहीं थी कि दरवाजा न खोल सकें या खुद टहल नहीं सकते थे। परंतु अजीब सी स्थति में जकड़े हुए थे। यह कोई बाहरी आकलन नहीं था वह खुद भी अपनी बातों में इस अनुभव की चर्चा कर चुके थे। वह अक्सर चुप रहते। लेकिन उन्हें गौर से कोई देखे तो लगेगा कि वे हमेशा कुछ कहना चाह रहे हैं। लेकिन बात बाहर नहीं आ पा रही है।
एक दिन उन्होंने अपनी डायरी निकालीं। बल्कि बहुत सारी डायरियां निकाली और सामने रखते गए। हर साल की फरवरी में उनकी डायरी की शुरुआत होती थी और कुल जमा चार दिनों की लिखाई के बाद समाप्त।
यह क्या है भाईसाब
डायरी का मतलब ऐसा तो कहीं नहीं है कि हमेशा सर्वश्रेष्ठ ही दर्ज किया जाए। या फिर आप खुद सर्वश्रेष्ठ की कल्पना भी कैसे कर सकते? आप तो बस लिख सकते हैं जैसा अपने देखा जैसा आपने महसूस किया। और इतनी लंबी उम्र इतने संसाधन, इतने मैके फिर भी कोरे पन्ने?
अपने आप को कबीर मानते होंगे, मन में कौतुक जागा। लेकिन व्यक्त नहीं कर सका। पता नहीं बुरा मान जाएं।
पन्ने पलट रहा था वे कहने लगे। पिछले संस्थान में जहां काम करता था। बड़े आत्मीय और सच्चे लोग थे। आंखें देखकर समझ जाते थे - एक ने कहा था। तुम्हें देखकर ऐसा लगता है कि बहुत भीतर कहीं फंसे हुए हो।
--- और आपने मान लिया कि सचमुच फंसे हुए हैं। भाईसाब निर्भार हो जाइए। यह तो एकदम से वैसे लोगों की बात है जिनके सामने किसी समस्या का नाम लो , बीमारी का नाम लो, कोई अनुभव रखो तपाक से बोलते हैं - हां, मुझे भी ऐसा है, मैं भी यह महसूस करता हूं। अब पता नहीं कितने बरसों पहले किसी ने कहा कि आप अंदर से कहीं फंसे हुए लगते हो और आपने मान लिया। मान ही नहीं लिया पकइ़कर बैठ गए। ---
उनके चेहरे पर हल्की सी हंसी आई। उसी तरह जैसे वह हंसना तो खुल कर चाहते थे लेकिन वह खुलकर हंसना कहीं अंटक गया और उसके धक्के भर से चेहरे पर एक मुस्कान भर तैर गई।
भाईसाब आप हंसते हुए खूबसूरत लगते हैं। और बोलते हैं तो बिल्कुल सहज। आप लिखेंगे तो बहुत लोग मुक्त हो सकेंगे। लिखिए अपनी मुक्ति के लिए न सही औरों के लिए ही। बेलाग लिखिए। बेहिचक लिखिए। बिंदास लिखिए।
और आज कल मैं भाईसाब के लिखने का इंतजार कर रहा हूं।
एक दिन उन्होंने अपनी डायरी निकालीं। बल्कि बहुत सारी डायरियां निकाली और सामने रखते गए। हर साल की फरवरी में उनकी डायरी की शुरुआत होती थी और कुल जमा चार दिनों की लिखाई के बाद समाप्त।
यह क्या है भाईसाब
डायरी का मतलब ऐसा तो कहीं नहीं है कि हमेशा सर्वश्रेष्ठ ही दर्ज किया जाए। या फिर आप खुद सर्वश्रेष्ठ की कल्पना भी कैसे कर सकते? आप तो बस लिख सकते हैं जैसा अपने देखा जैसा आपने महसूस किया। और इतनी लंबी उम्र इतने संसाधन, इतने मैके फिर भी कोरे पन्ने?
अपने आप को कबीर मानते होंगे, मन में कौतुक जागा। लेकिन व्यक्त नहीं कर सका। पता नहीं बुरा मान जाएं।
पन्ने पलट रहा था वे कहने लगे। पिछले संस्थान में जहां काम करता था। बड़े आत्मीय और सच्चे लोग थे। आंखें देखकर समझ जाते थे - एक ने कहा था। तुम्हें देखकर ऐसा लगता है कि बहुत भीतर कहीं फंसे हुए हो।
--- और आपने मान लिया कि सचमुच फंसे हुए हैं। भाईसाब निर्भार हो जाइए। यह तो एकदम से वैसे लोगों की बात है जिनके सामने किसी समस्या का नाम लो , बीमारी का नाम लो, कोई अनुभव रखो तपाक से बोलते हैं - हां, मुझे भी ऐसा है, मैं भी यह महसूस करता हूं। अब पता नहीं कितने बरसों पहले किसी ने कहा कि आप अंदर से कहीं फंसे हुए लगते हो और आपने मान लिया। मान ही नहीं लिया पकइ़कर बैठ गए। ---
उनके चेहरे पर हल्की सी हंसी आई। उसी तरह जैसे वह हंसना तो खुल कर चाहते थे लेकिन वह खुलकर हंसना कहीं अंटक गया और उसके धक्के भर से चेहरे पर एक मुस्कान भर तैर गई।
भाईसाब आप हंसते हुए खूबसूरत लगते हैं। और बोलते हैं तो बिल्कुल सहज। आप लिखेंगे तो बहुत लोग मुक्त हो सकेंगे। लिखिए अपनी मुक्ति के लिए न सही औरों के लिए ही। बेलाग लिखिए। बेहिचक लिखिए। बिंदास लिखिए।
और आज कल मैं भाईसाब के लिखने का इंतजार कर रहा हूं।
Sunday, May 20, 2007
आरंभ
.....भाईसाब हैं तो एक कस्बे के। लेकिन पिताजी की नौकरियों के चक्कर में कई जगहों के चक्कर काट चुके हैं। उनमें कई जगह का पानी और कई जगह की बानी है। और अब महानगर में हैं। फिर भी हर आदमी को कभी न कभी इस आम प्रश्न का सामना करना ही पड़ता है - वह सब तो ठीक है लेकिन आप मूलत: हैं कहां के? उनसे जब भी पूछता हूं कि आप कहां के हैं? वे इसे टाल जाते हैं। बस बचपन मंे जहां स्कूल किया था और कुछ कॉलेज के दिन कोई व्यंजन कोई खांटी स्वाद कुछ नहीं । बस ऐसे ही हैं जनाब। उनके इस अंदाज पर मुझे बड़ी कोफ्त होती है। आदमी जहां कहीं भी जन्मा हो वहां के गीत, संगीत, किस्से कहानियों से परिचित तो होता ही है। इसके बगैर बड़ा कैसे हो सकता है। मुझे अक्सर लगता है कि भाईसाब बस टाल रहे हैं कि कह दिया तो गीत सुनाना पड़ेगा या फिर कुछ बनाकर खिलाना पड़ेगा।
बहरहाल, गीत और व्यंजन ना आए तो भी चलता है। भाईसाब में और भी तो गुण हैं। मसलन वे कमाल के पेशेवर अंदाजवाले हैं। काम करते हैं तो भूत की तरह। उसमें कोई कोताही नहीं। और कुछ भी तकनीकी मसला हो उसको ठोक बजाकर सीखने में उनका सानी नहीं। विज्ञान की पढ़ाई की है। बस ग्रेजुएट भर हैं। लेकिन उनसे बात करो तो पता चलता है कि पहले क्यों लोग अपने घर के आगे बी.ए. की डिग्रियां लटकाते थे। अब तो बी.ए., बी.एस.सी वाले किलो के भाव भी कोई नहीं पूछता।
उनसे यह बात कहो तो फूले नहीं समाते। बताते हैं इसमें उस संस्था का योगदान है जहां मैंने छह सात साल काम किया। वे बार बार एकलव्य के सीखने के अंदाज को बयान करते हैं। कौन था उसका गुरू ? बस सीखने की चाहत और कड़ा परिश्रम। खुद करके देखना। जूझते हुए लक्ष्य को भेदना ! यह सब उनके तकिया कलाम हैं। लेकिन यह सब ऐसी बातें हैं जिन्हें गंभीर बनने के लिए कोई भी कहता रहता है। या जैसे ही कोई कम आत्मविश्वास वाला आदमी मिलता है उसको प्रवचन की मुद्रा में आप सुना सकते हैं।
भाईसाब बीच में सिनेमा को कोर्स कर आए। कुछ एक डाक्यूमेंट्री फिल्में भी बनाईं। पहले एक बड़े फिल्मकार के साथ काम किया और अब खुद की अपनी एक कंपनी बना ली है। कुछ अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी झटक लाये हैं। यानी फिल्म की दुनिया में में इतना समय बिता लिया है कि उसके गुर, दांव पेंच में परिपक्व हो गए हैं।
अब उन्हें यह खूब पता है कि किससे कैसे बात करनी है। किससे कौन सा काम निकालना है और क्रेडिट नहीं देना है। कैसे लोगों से आइडियाज लेने हैं और अपनी चाशनी चढ़ाकर सिद्धांत टीप देना है। कोशिश यह करो की सामने वाले को उसकी खबर तक नहीं लगे। कैसे सामने वाले से ही बुलवाते रहो और अपनी बारी आए तो चुप्पे मियां बन जाओ। यानी सामनेवाले के सारे संसाधनों को मुफ्त में मार लो और कहो कि इस पर तो अभी काम करना है। इसमें पैसे की कोई गूंजाइश नहीं है।
कभी-कभी मन करता है उनसे पूछूं - भइया, इसमंे अभी पैसे की गूंजाइश नहीं है लेकिन ऐसा करार क्यों नहीं कर लें कि जब गूंजाइश होगी तब मेरा भी हिस्सा होगा। लेकिन अपन अभी इतने बेशर्म नहीं हो पाए हैं। भाइसाब को देखते हुए मुझे अक्सर विकास के नाम पर हो रही बहस याद आती है कि विकास के कुछ लोगों को शहादत तो देनी ही पड़ती है। बंधुवर विकास जब होना है तो शहादत ही क्यों विकास में हिस्सेदारी क्यों नहीं! मुझे ऐसे सवाल दागने का मौका नहीं मिला लेकिन आपको मिले तो चूकिएगा नहीं। और हां भाइसाब मिलें तो उनसे भी बेहिचक पूछिएगा, मेरी तरह संकोच न कीजिएगा! आमीन...
बहरहाल, गीत और व्यंजन ना आए तो भी चलता है। भाईसाब में और भी तो गुण हैं। मसलन वे कमाल के पेशेवर अंदाजवाले हैं। काम करते हैं तो भूत की तरह। उसमें कोई कोताही नहीं। और कुछ भी तकनीकी मसला हो उसको ठोक बजाकर सीखने में उनका सानी नहीं। विज्ञान की पढ़ाई की है। बस ग्रेजुएट भर हैं। लेकिन उनसे बात करो तो पता चलता है कि पहले क्यों लोग अपने घर के आगे बी.ए. की डिग्रियां लटकाते थे। अब तो बी.ए., बी.एस.सी वाले किलो के भाव भी कोई नहीं पूछता।
उनसे यह बात कहो तो फूले नहीं समाते। बताते हैं इसमें उस संस्था का योगदान है जहां मैंने छह सात साल काम किया। वे बार बार एकलव्य के सीखने के अंदाज को बयान करते हैं। कौन था उसका गुरू ? बस सीखने की चाहत और कड़ा परिश्रम। खुद करके देखना। जूझते हुए लक्ष्य को भेदना ! यह सब उनके तकिया कलाम हैं। लेकिन यह सब ऐसी बातें हैं जिन्हें गंभीर बनने के लिए कोई भी कहता रहता है। या जैसे ही कोई कम आत्मविश्वास वाला आदमी मिलता है उसको प्रवचन की मुद्रा में आप सुना सकते हैं।
भाईसाब बीच में सिनेमा को कोर्स कर आए। कुछ एक डाक्यूमेंट्री फिल्में भी बनाईं। पहले एक बड़े फिल्मकार के साथ काम किया और अब खुद की अपनी एक कंपनी बना ली है। कुछ अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी झटक लाये हैं। यानी फिल्म की दुनिया में में इतना समय बिता लिया है कि उसके गुर, दांव पेंच में परिपक्व हो गए हैं।
अब उन्हें यह खूब पता है कि किससे कैसे बात करनी है। किससे कौन सा काम निकालना है और क्रेडिट नहीं देना है। कैसे लोगों से आइडियाज लेने हैं और अपनी चाशनी चढ़ाकर सिद्धांत टीप देना है। कोशिश यह करो की सामने वाले को उसकी खबर तक नहीं लगे। कैसे सामने वाले से ही बुलवाते रहो और अपनी बारी आए तो चुप्पे मियां बन जाओ। यानी सामनेवाले के सारे संसाधनों को मुफ्त में मार लो और कहो कि इस पर तो अभी काम करना है। इसमें पैसे की कोई गूंजाइश नहीं है।
कभी-कभी मन करता है उनसे पूछूं - भइया, इसमंे अभी पैसे की गूंजाइश नहीं है लेकिन ऐसा करार क्यों नहीं कर लें कि जब गूंजाइश होगी तब मेरा भी हिस्सा होगा। लेकिन अपन अभी इतने बेशर्म नहीं हो पाए हैं। भाइसाब को देखते हुए मुझे अक्सर विकास के नाम पर हो रही बहस याद आती है कि विकास के कुछ लोगों को शहादत तो देनी ही पड़ती है। बंधुवर विकास जब होना है तो शहादत ही क्यों विकास में हिस्सेदारी क्यों नहीं! मुझे ऐसे सवाल दागने का मौका नहीं मिला लेकिन आपको मिले तो चूकिएगा नहीं। और हां भाइसाब मिलें तो उनसे भी बेहिचक पूछिएगा, मेरी तरह संकोच न कीजिएगा! आमीन...
Wednesday, May 16, 2007
भाईसाब और बहनजी के बारे में कुछ शब्द
भाईसाहब बड़े जिंदादिल इंसान हैं। वे हर कहीं हर वक्त नजर आ जाते हैं। यानी जब भी उन्हें याद करो वे हाजिर हैं। उनकी भूमिकाएं बदलती रहती हैं। जगहें बदलती रहती हैं। लेकिन वह हर हाल में परिस्थिति से जूझते नजर आते हैं। उनको कभी हताश भाव में नहीं देखा। जैसे उन्होंने निष्काम भाव साथ लिया हो । जीवन मरण, सुख दुख जीवन के उतार चढ़ाव उन्हें विचलित नहीं करते। उनके साथ रहना । उनसे बातें करना। उनके बारे में जानना हमेशा एक रोचक अनुभव रहा है। कोशि करुंगा आपसे बांटता रहूं । वैसे यह आपस की बात है। लेकिन उनके साथ बहन जी भी दिखती हैं। यहां बहन जी का कम जिक्र है लेकिन वे भी कोई कम नहीं हैं। मामला बिल्कुल बराबरी का है। तो मिलते हैं अगली बार सब्बा खैर....
Tuesday, May 15, 2007
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